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Saturday, March 19, 2011

होली का इतिहास (बुराइयों के अंत का प्रतीक)

होली का इतिहास (बुराइयों के अंत का प्रतीक)


होली
होली
होली के अवसर पर गुलाल से रंगीन चेहरा।


होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से 2 दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंगअबीर-गुलाल इत्यादि लगते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से मित्र बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का क्रम दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।[१]
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है।[२] राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन सेफाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।[३] यह एक अत्यंत प्राचीन धार्मिक, सामाजिक उत्सव है जिसका उद्देश्य : धार्मिक निष्ठा, व उत्सव, मनोरंजन द्वारा सांस्कृतिक परम्पराओं को जीवित रखना है।  
होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका[४] नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली
अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की चित्रावली हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।[५] शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था।[६] अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।[७] मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।[८]
भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।[९] प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।[१०]
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढीराधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।[११] कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।[१२]

परंपराएँ

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। । वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।[१३]

होलिका दहन
होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए[१४] जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में 7 भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से 7 बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।[१४] लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।
सार्वजनिक होली मिलन
होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजीभांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने के कारण से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता ।

विशिष्ट उत्सव

भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली[१५] काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा औरवृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी[१६] में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल जात्रा[१७] चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी[१८] में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो[१९] में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला[२०] में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। तमिलनाडु की कमन पोडिगई[२१] मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि मणिपुर के याओसांग[२२] में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी[२३] में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया[२४], जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ[२५] जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली[२६] में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

साहित्य में होली

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली[क] तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारविमाघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्यपृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदासरहीमरसखानपद्माकर[ख] , जायसीमीराबाईकबीर और रीतिकालीन बिहारीकेशवघनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं।[२७] इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।[२८] सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाअमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।[६]आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँतेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय होतथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सवयश चोपड़ा की सिलसिलावी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।[२९]

संगीत में होली

भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल औरठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं।बसंतबहारहिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैतीदादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है री।[३०] इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता हैं।[३१] भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।

आधुनिकता का रंग

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, किन्तु होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं।[३२] किन्तु इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं।[३३] रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।[३४] होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अनुमान गत वर्ष होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है  से लगाया जा सकता है।[३५]

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Friday, March 18, 2011

रा. स्व. संघ, अ. भा. प्र. सभा संपन्न, दिनांक: 11, 12, 13 मार्च, पुत्तूर (कर्नाटक)

रा. स्व. संघ, अ. भा. प्र. सभा संपन्न, दिनांक: 11, 12, 13 मार्च, पुत्तूर (कर्नाटक)
statue Vicvekanand Putturश्री मोहन जी भागवत ने विवेकानंदा कॉलेज पुत्तूर, के प्रांगन में सभा स्थल पर स्वामी विवेकानंदा जी की मूर्ति का अनावरण भी किया

रा. स्व. संघ, की शीर्ष सभा, अ. भा. प्र. सभा की वार्षिक बैठक, 11 से 13 मार्च को पुत्तूर (कर्नाटक के दक्षिणा  कन्नडा  जिले) में संपन्न हुई. देश के सभी क्षेत्रों की संघ की शाखाओं से चुने प्रतिनिधिओं, संघ के प्रान्त स्तरीय पदाधिकारी गण, 3 दिवसीय बैठक में उपस्थित रहे. संघ की प्रेरणा से चलने वाले कई महत्वपूर्ण संगठनों के राष्ट्रिय पदाधिकारी भी इसमें आमंत्रित किये गए थे.संघ की प्रान्त स्तरीय गतिविधियों का लेखाजोखा तथा कई महत्व पूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार कर आवश्यक प्रस्ताव पारित किये गए.जिनमें से प्रस्ताव नीचे दिए जा रहे हैं. देश के कोने कोने से समाज जीवन के विविध क्षेत्रों से जुड़े 1200 से अधिक सामाजिक कर्कर्ताओं ने इसमें भाग लिया. यह उल्लेखनीय है कि 50000 की जनसँख्या का एक छोटा तहसील इस महत्त्व पूर्ण कार्य का आयोजन करता है. आसपास के ग्रामीणों के स्वैच्छिक सहयोग से पुत्तूर के लोगों ने उत्साह पूर्वक बैठक की सभी आवश्यक व्यवस्थाएं संपन्न की.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा - 2011, युगाब्द 5112
दिनांक: 11, 12, 13 मार्च 2011  पुत्तूर  (कर्नाटक)
प्रस्ताव क्र. - 1 (12.03.11)
भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार आवश्यक
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, देश में तेज गति से व्यापक स्तर पर उभर रहे भ्रष्टाचार के अन्तहीन प्रकरणों की शृंखला पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करती है। यह बात और भी स्तब्ध कर देने वाली है कि प्रधानमंत्री-सहित सरकार में उत्तरदायी पदों पर आसीन प्रमुख पदाधिकारीगण भ्रष्टाचार के सभी अकाट्य प्रमाणों को नकारते हुए,अपनी पूरी शक्ति,इन प्रकरणों में लिप्त दोषी व्यक्तियों को निर्दोष कहकर उन्हें अन्तिम पल तक बचाने में लगे हुए हैं।
अ. भा. प्रतिनिधि सभा यह परिदृष्य देख व्यथित है कि नित्य उजागर(प्रगट()) हो रहे नये-नये घोटालों से देश की गरिमा व प्रतिष्ठा पर गम्भीर आँच आ रही है। भ्रष्टाचार का व्याप व परिमाण ऐसा है कि उसका आकलन करने में जनसामान्य ही नहीं, विशेषज्ञों तक की बुद्धि चकरा जाती है। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजनों में हुई व्यापक धाँधली ने पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचाया है। देश के शासक या तो आँखें मूंद कर बैठे हैं, या न्यायपालिका और प्रचार माध्यमों के दबाव में, मात्र दिखावे के लिए दोषीयों के विरुद्ध कदम उठा रहे हैं । केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति जैसे अत्यंत संवेदनशील प्रकरण में सत्ताशीर्ष द्वारा की गयी गलती के पीछे क्या विवशता थी एवं कौनसी अदृष्य शक्ति थी, इसे देश जानना चाहता है।
दुर्भाग्यवश, स्वातंत्र्योत्तर भारत में समाज-जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में राजनीति के बढ़ते वर्चस्व के साथ ही सत्ताशीर्ष से होनेवाले भ्रष्टाचार की घटनाएँ निरंतर बढ़ती गई हैं । स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्र ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमानस की व्यापक प्रतिक्रिया को विराट जन-आंदोलनों में परिवर्तित होते देखा है। 1974-75 का जे.पी. आंदोलन व आपात्काल तथा 1987-89 में बोफोर्स घोटाले को लेकर हुए आंदोलन, दोनों की तार्किक परिणति सत्ता-परिवर्तन में हुई। परन्तु इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार घटा हो; ऐसा प्रतीत नहीं होता है। वरन् इसके विपरीत आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद भ्रष्टाचार का प्रकार व परिमाण अधिक जटिल व व्यापक होता गया है। 1992 का शेयर घोटाला हो या वर्तमान 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, सभी में अकूत धनराशी की हेराफेरी हुई है। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि लगातार बढ़ते जा रहे इस भ्रष्टाचार को करने वाले अधिकतर लोग उच्च शिक्षित और समाज के समृद्ध वर्ग के हैं। ये सारे तथ्य इस बात का सुस्पष्ट संकेत देते हैं कि समाज में व्यक्ति-निर्माण की प्रक्रिया को अधिक सघन व व्यापक करने की आवश्यकता है।
इस सम्बन्ध में अ.भा.प्र.स. का यह भी मानना है कि समाज जीवन के सभी अंगों को धर्माधारित, मूल्यपरक व नैतिकतापूर्ण करने की नितान्त आवश्यकता है। यह कार्य शिक्षा व्यवस्था को चरित्र निर्माण में सक्षम,राष्ट्रीय चेतनापरक व सत्संस्कारयुक्त बनाने से ही सम्भव होगा। साथ ही समाज जीवन में नैतिक मूल्यों के संवर्द्धन के लिये उच्च पदासीन व्यक्तियों को अपने आचरण से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे।
इन दूरगामी परिणाम देने वाले सुधारों के साथ ही, शासन -प्रशासन की प्रणाली में तत्काल सुधार और उसके लिए प्रभावी जनजागरण भी उतना ही आवश्यक हो गया है। शासन व्यवहार में पारदर्शिता, सरलतम और न्यूनतम कानूनों के द्वारा प्रशासन, सुगम तथा शीघ्र परिणाम देने वाली न्याय-प्रणाली, काले धन की समाप्ति और राजनीति के अपराधीकरण व उसमें धन बल के बढ़ते प्रभाव पर रोक लगाने में सक्षम चुनाव-प्रणाली जैसे सभी सुधार तीव्र गति से करने की आवश्यकता है। वर्तमान शासन के भ्रष्टाचार को साहसपूर्वक उजागर करने वाले सतर्क व क्रियाशील लोगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर दण्ड-विधान की भी आवश्यकता है। वस्तुतः आज जन-जीवन को त्रस्त कर रही सारी समस्याओं यथा - मँहगाई, बेरोजगारी व काले धन के लिए भ्रष्टाचार की विषबेल ही उत्तरदायी है, जो आज देश के विकास और अंतर्बाह्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर रही है। काले धन की समस्या के संदर्भ में तो सरकार को देश -विदेश में जमा सम्पूर्ण काले धन को राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित कर उसका अधिग्रहण करते हुए उसे देश के विकास में लगाना चाहिए।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा आज की विपरीत परिस्थिति में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए संघर्षरत सभी व्यक्तियों, संगठनों, संवैधानिक संस्थाओं व जागरूक प्रचारमाध्यमों के प्रयासों तथा न्यायपालिका की सतर्कता की सराहना करती है एवं देश की जनता का आवाहन करती है कि सब लोग पूर्ण वैयक्तिक शुचिता के साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐसे सारे प्रयासों को मुखर जनमत का बल प्रदान करें तथा व्यक्ति-निर्माण की स्वस्थ पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं का जतन करें।
 प्रस्ताव क्र. 2
राष्ट्रीय हितों व सुरक्षा के विरुद्ध चीनी षड़यन्त्रों को विफल करें
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा चीन के बहु-आयामी खतरों और उसकी आक्रामक व धमकी भरी चालों के प्रति भारत सरकार के निस्तेज व्यवहार पर गम्भीर चिन्ता व्यक्त करती है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा किये जा रहे गम्भीर सीमोल्लंघनों से सरकार सतत इन्कार कर रही है और उनके बारे में लापरवाही पूर्वक यह कह रही है कि ‘यह वास्तविक नियन्त्रण रेखा के बोध में समान दृष्टी का अभाव है’। दोनों देशों के रणनीतिक विरोधाभास को कम करके आंकते हुये चीन की विस्तारवादी व साम्राज्यवादी कुटिलताओं को उजागर करने में विफल हो रही है। यह स्थिति राष्ट्रीय हितों के लिये घातक सिद्ध हो सकती है।
अ.भा.प्र.स. सचेत करती है कि चीन व पाकिस्तान के बीच बढ़ता सैन्य व असैन्य सहयोग, अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गम्भीर चिंता का विषय है। स्कार्डू क्षेत्र (पाक अधिकृत कश्मीर ) में निर्माण कार्यों व काराकोरम राजमार्ग की मरम्मत की आड़ में दस हजार चीनी सैन्य बल की उपस्थिति एक गम्भीर मुद्दा है जो कश्मीर की घेराबन्दी का ही प्रयत्न है। चीन द्वारा अपना वर्चस्व स्थापित करने वाले अन्य चिंताजनक विषयों में पाकिस्तान को एक गीगा वाट का नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र देना और बैलिस्टीक प्रक्षेपास्त्रों की प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना है, जो क्षेत्र में सम्भावित नाभिकीय युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है।
हाल की कई घटनाओं में चीन के दुर्भावनापूर्ण इरादे उजागर हुए हैं। उसने यह मिथ्या आरोप लगाया है कि भारत ने अरुणाचल व सिक्किम सहित चीन की 90,000 वर्ग कि.मी. भूमि दबा रखी है। वह अपने मानचित्रों में जम्मू कश्मीर प्रदेश को भारत का अंग नहीं दिखा रहा है। जम्मू कश्मीर में1600 कि.मी. लंबी भारत-तिब्बत सीमा पर, नियंत्रण रेखा को भी नही दिखा रहा है। अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ जम्मू कश्मीर के भारतीय नागरिकों को भी पृथक काग़ज पर वीजा देना आरंभ कर दिया है। चीनी सैन्य टुकड़ियों ने पिछले वर्ष डेमचोक के गोम्बीर क्षेत्र में घुस कर वहाँ चल रहे निर्माण कार्य रुकवा दिये थे। नवम्बर 2009 में लद्दाख में केन्द्र प्रायोजित नरेगा योजना के अंतर्गत हो रहा सड़क निर्माण भी चीनी सेना की आपत्ति पर रोक दिया गया है। वस्तुतः चीन ने ही नियंत्रण रेखा के अंदर घुसकर हमारे क्षेत्र पर कब्जा जमाया और वहाँ सैन्य उद्देशों के लिए 54 कि.मी. लंबी सडक बनायी है।
अपने देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में चीन द्वारा रचे जा रहे षड़यंत्रों को भी अ.भा.प्र.स. एक गम्भीर संकट के रूप में देखती है। अरुणाचल पर उसके द्वारा सतत जताए जा रहे दावे को भी हल्का करके नहीं आंकना चाहिये क्योंकि वहाँ चीन ने मात्र उस प्रदेश पर ही नहीं वरन् संपूर्ण पूर्वोत्तर पर दृष्टी गड़ा रखी है। हाल ही में देश की एक प्रमुख साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित एन.एस.सी.एन. विद्रोहियों जैसे आतंकवादी गुटों को प्रोत्साहित करने एवं उन्हें शस्त्रास्त्र और वित्तीय सहायता प्रदान करने में चीन की संलिप्तता के प्रमाण भी हमें उस दिशा में सतर्क करने को पर्याप्त है। एन.एस.सी.एन. के अतिरिक्त एन.डी.एफ.बी. व उल्फा विद्रोहियों को भी चीन संबल दे रहा है। यह भी गम्भीर चिन्ता का विषय है कि इस क्षेत्र में आई.एस.आई. भी चीन के साथ मिलकर काम कर रही है। देश के विभिन्न भागों में चीनी गुप्तचरों के पकड़े (पाए) जाने की बढ़ती हुई घटनाओं पर प्रतिनिधि सभा अपनी चिंता व्यक्त करती है।
यह भी सुविदित है कि चीन के शासकीय शस्त्र उत्पादकों द्वारा उत्पादित शस्त्रास्त्र बांगला देश के कॉक्स बाजार जैसे अवैध अड्डों के माध्यम से भारतीय माओवादियों और अन्य आतंकवादियों तक पहुँच रहे हैं। चीन द्वारा भारत में नकली मुद्रा भेजी जा रही है। अ.भा.प्र.स. सरकार व जनता का ध्यान चीनी शासन के नियंत्रण में चलने वाले प्रसार माध्यमों के उन प्रकाशनों की ओर भी आकृष्ट करना चाहती है जिनमें भारत को 20-30 भागों में विखण्डित करने की बात कही गई है।
भारत के बाजारों में चीनी वस्तुओं के व्यापक प्रवेश से भारतीय उद्योगों पर हो रहे प्रतिकूल प्रभावों के साथ ही हमारी सुरक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं रणनीति के लिए भी गम्भीर चुनौती उत्पन्न हो गई है। अ.भा.प्र.स. चाहती है कि सरकार हमारे तंत्र में व्यापार व वाणिज्य के माध्यम से हो रही चीनी घुसपैठ को गम्भीरता से ले। सभी नागरिक देशभक्ति का परिचय देते हुए चीनी वस्तुओं के उपयोग से बचें।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा भारत सरकार व देशवासियों का ध्यान दक्षिण मध्य तिब्बत क्षेत्र में नदियों के जल का प्रवाह मोड़ने के चीनी खतरे की ओर आकृष्ट करना चाहती है। अपने इस प्रयास द्वारा चीन तिब्बत स्थित कैलाश-मानसरोवर से निकलने वाली सिन्धु व ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जल पर भारत, नेपाल, भूटान, बांगला देश, म्याँमा व थाईलैण्ड जैसे देशों के न्यायोचित अधिकार का हरण कर रहा है। जल प्रबंधन के विषय में चीन के अतिगोपनीयता वाले रुख के कारण वर्ष 2007 में जल संबंधी मुद्दों का हल ढूंढ़ने के लिए स्थापित की गई भारत-चीन संयुक्त प्रणाली भी अवरुद्ध हो गई है। हमारे दो प्रदेश - हिमाचल व अरुणाचल में अचानक बाढ़ से तबाही हुई। उस समय यह संदेह उत्पन्न हुआ कि इसका कारण जल प्रवाह में चीन द्वारा की गई छेड़छाड़ है। हमारे इंजीनियरों को नदी की ऊपरी धारा का निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी गई थी। प्रतिनिधि सभा सरकार को सचेत करना चाहती है कि यदि इस विवाद का समाधान तत्काल नहीं ढूंढ़ा गया तो दोनों देशों के बीच इसे लेकर गम्भीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
प्रतिनिधि सभा सरकार से आग्रह करती है कि अपने पड़ोस में ही नहीं अपितु अफ्रीका एवं पश्चिम एशिया जैसे रणनीतिक दृष्टी से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी चीन की बढ़ती सैनिक व कूटनीतिक शक्ति की तरफ ध्यान दे। चीन अपनी 31 लाख सेना का अत्याधुनिक शस्त्र व प्रौद्योगिकी के साथ तीव्र गति से आधुनिकीकरण कर रहा है। चीन तिब्बत, नेपाल व भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों तथा रेल लाईनों का जाल बिछा चुका है। हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन आज एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है। उत्तर कोरिया, सूडान सहित अनेक देशों के उन्मत्त तानाशाह शासकों के साथ चीन के गहरे संबंध हैं। चीन के रणनीतिकारों का यह विचार खतरनाक है कि चीन को किसी भी परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के विरुद्ध अपनी सुरक्षा के नाम पर आणविक हमले का प्रथम अधिकार सुरक्षित रखना चाहिए। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिदृष्य में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा सरकार का आवाहन करती है कि:
1 चीन द्वारा भारत की कब्जा की गई एक-एक इंच भूमि को वापस लेने के सन् 1962 के संसद के सर्व सम्मत संकल्प को दोहराया जाए।
2 हमारी सेना के शीघ्र आधुनिकीकरण एवं सैन्य ढांचागत सुविधाओं के उन्नयन के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाएँ। इस हेतु सीमांत क्षेत्रों में अधिसंरचना का निर्माण करने पर विशेष बल दिया जाए। सीमावर्ती क्षेत्रीय विकास अभिकरण (एजेन्सी) के गठन पर विचार किया जाना चाहिए जिससे सीमावर्ती क्षेत्र के गाँवों से लोगों का पलायन भी रुक सके।
3 विश्व के समक्ष चीन के मनसूबों को उजागर (स्पष्ट) करने के लिए आक्रामक कूटनीति का उपयोग किया जाए। आसियान व संयुक्त राष्ट्र सहित सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस दृष्टी से कुशल उपयोग हो।
4 भारत के बाजार में चीनी उत्पादकों को खुले खेल की अनुमति न दी जाए। खिलौने, मोबाईल तथा अन्य प्रकार के चीनी उत्पादों की बिक्री पर तत्काल रोक लगाई जाए। सीमावर्ती दर्रो के माध्यम से किये जा रहे अवैध व्यापार दृढ़ता-पूर्वक रोका जाना चाहिए।
5 वीजा नियमों का कठोरता से पालन किया जाय तथा भारत में कार्यरत चीनी नागरिकों पर सतर्क दृष्टी रखी जाए।
6 रणनीतिक दृष्टी से महत्वपूर्ण क्षेत्रों एवं संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी कंपनियों को प्रवेश की अनुमति न दी जाए।
7 नदी जल प्रवाह को रोकने के अवैध चीनी प्रयासों के विरुद्ध म्याँमा व बांगला देश जैसे नदी तटीय देशों को एकजुट किया जाए।
English version
ABPS of RSS held on March 11 to 13 at Puttur-Karnataka
statue Vicvekanand PutturShri. Mohan ji Bhagwat also unveiled a Statue of Swami Vivekananda at the Premises of Vivekananda College Puttur, where the ABPS was held.
Annual meeting of Akhil Bharateeya Pratinidhi Sabha(ABPS), the apex body of Rashtreeya Swayamsevak Sangh (RSS), held on March 11th to 13th in Puttur of Dakshina Kannada District of Karnataka. Representatives elected from RSS-Shakhas of all regions of the country, state level office bearers of RSS, attended the 3 days of the meeting. National office bearers of various important organizations inspired by the Sangh were also invited to attend the meeting. Along with review of State wise activities of the RSS, important national issues discussed and necessary resolutions passed in the meeting. More than 1200 Social workers of different walks of life from nook and corners of the country also participated in the meeting. It is interesting to note that a small Tahasil head quarter with a population of around 50000 was host in such an important event. People of Puttur with the cooperation of residents of surrounding villages have volunteered enthusiastically to complete the necessary arrangements for the meeting.

Rashtriya Swayamsevak Sangh 
Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha 2011, Yugabda 5112
March 11-13, 2011  Puttur (Karnataka)
Resolution -1 (12-03-11)
Need for a decisive blow against courruption
The Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha expresses grave concern over the endless chain of incidents of widespread corruption surfacing in the country. It is all the more shocking that the people occupying the upper echelons in the Government, including the Prime Minister are engaged in protecting their guilty colleagues till the end by describing them as innocent inspite of incontrovertible evidences pouring out against them.
The ABPS is deeply pained at the way the cases of corruption coming to light, day in and day out are tarnishing the image and reputation of the nation. The magnitude of corruption is such that not only the common man, but even the experts get bewildered. The gross misdeeds in organizing the Commonwealth games have gravely damaged the prestige of the country. People at the helm of power are either turning a blind eye or are taking steps against the guilty as an eye wash under the pressure of the judiciary and media. The country wants to know as to what was the compulsion and which invisible hand was behind the misdemeanor of the top rung of power in a most sensitive matter like the appointment of the Central Vigilance Commissioner.
Unfortunately, the influence of politics is growing in almost every walk of life and the instances of corruption indulged in by the people in seats of power in the post independence era are constantly on the rise. After the Independence, the country has witnessed public anger against corruption resulting in powerful mass movements. The J. P. movement of 1974-75 and imposition of emergency and the mass movement triggered by the Bofors scandal in 1987-1989 culminated in the change of power at the center. But, the change does not seem to have brought about any decline in corruption. On the contrary the form and dimensions of corruption seem to have become more complex and extensive in the wake of economic liberalization. Whether it is the share scandal of 1992 or the recent 2G spectrum scandal, mind boggling figures of money are found to be involved. What needs special mention is that the people involved in these ever increasing acts of corruption are people who are highly educated and belong to the affluent class of the society. All these facts clearly indicate that there is need for further intensification and expansion of the process of man-making.
In this regard the ABPS believes that there is a dire need to organise every rung of social order on the firm foundation of value-based and morally strong conduct of life rooted in the eternal principles of Dharma. This is possible only by reorienting education-system to reflect the national ethos and serve as an effective instrument of character-building and imparting noble samskars. At the same time it is imperative for the people in high positions that they present exemplary models of conduct in their private and public life.
Apart from these reforms of far-reaching consequences, reform in the system of governance & administration and mobilising effective public opinion in favour of that, is equally important. Transparency in governance, administration through minimum and simplified regulations, judicial system based on easy access and timely dispensation of justice, elimination of black money, electoral system capable of effectively curbing the criminalisation of politics and checking the growing influence of money power are a few reforms urgently needed. It is also imperative to ensure proper security for the whistle blowers who courageously expose corruption in the present system at different levels and to have stringent penal provisions against the corrupt. Indeed the poisonous creeper of corruption is responsible for all the contemporary social ills like inflation, unemployment and black money which has also been affecting the country’s development and the internal and external security. In connection with the problem of black money, the government should acquire black money stashed in the country and outside and declare it as the nation’s asset and deploy it for developmental purposes.
The ABPS appreciates the efforts of such courageous individuals, organizations and the constitutional institutions, alert media and vigilant Judiciary for their efforts against corruption in the present challenging scenario and calls upon the countrymen to extend their active support for such noble endevours with utmost personal integrity and also nourish our traditional social institutions actively involved in character-building of our citizens.
Defeat Chinese Designs against
our National Interests and Security
The Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha expresses serious concern over the growing multi-dimensional threat from China and the lackluster response of the Government of Bharat to its aggressive and intimidator tactics. Casual attitude and perpetual denial of our Government in describing gross border violations by the Chinese People's Liberation Army as a case of 'lack of common perception on the LAC', attempts to underplay the severe strategic dissonance between the two countries and failure to expose the expansionist and imperialist manouvers of China can prove fatal to our national interests.
The ABPS cautions that the growing civilian and defence ties between China and Pakistan are a matter of grave concern to our national security. Presence of the 10,000-strong Chinese Army in Skardu ( PoK) in the guise of construction works and repairs to Karakoram highway is a serious issue as it allows China to encircle Kashmir . Other issues of concern that best exemplify Chinese' assertiveness include its offer to export one - Gigawatt (GW) nuclear plant and transfer of ballistic missile technology to Pakistan thus precipitating potential nuclear conflict in the region.
The malafide intentions of China are conspicuous in a number of recent developments. It has falsely charged Bharat of occupying 90,000 sq. km of its territory (including Arunachal Pradesh and Sikkim); It is excluding the state of J&K from Bharat in its maps; It is also excluding 1600 KM-long border in J&K from the LAC on the Tibet-Bharat border; It has initiated issuing paper visas for Bharatiya citizens from J&K besides citizens from Arunachal Pradesh. The Chinese troops entered Gombir area in Demchok region last year and threatened the civilian workers to stop construction work. In November 2009, a road project under Centrally-sponsored National Rural Employment Guarantee Scheme (NREGS) in Ladakh, was stopped after objections were raised by the Chinese Army. Infact, it is China which has encroached upon our territory inside the LOC in that region and constructed a 54 km long road for military purposes.
The ABPS sees potential danger from the Chinese machinations in our North East. Its continued claims over Arunachal Pradesh shouldn't be taken lightly as it has set its eyes not only on that state but on the entire North East. Recent expose' in a leading Bharatiya weekly about the extent of the involvement of China in arming, encouraging and funding insurgent groups like the NSCN should awaken us to this danger. Besides NSCN insurgents other insurgent groups in the North East like the NDFB, ULFA etc also get patronage from China. It is also a matter of serious concern that the ISI too is operating in cahoots with China in this region. The A.B.P.S. expresses concern over the growing number of cases of Chinese spies being arrested in different parts of the country.
It is well-known that the weapons from the Chinese government weapon manufacturers find their way to the Maoists and other terrorist groups in Bharat through illegal weapon ports like Cox Bazar in Bangladesh. Fake currency also is being pumped into Bharat from China. The ABPS wants to draw the attention of the Government and people to the occasional publications in the officially-controlled Chinese media about dismembering Bharat into 20-30 pieces.
Penetration of Chinese goods into Bharatiya market is affecting our manufacturing industry adversely besides posing a serious challenge to our security, health, environment and strategic concerns. The ABPS wants the Government to tackle this issue of China's penetration into our system through trade and commerce with utmost seriousness. All citizens should refrain from using Chinese products as an expression of patriotism.
The ABPS wants to draw the attention of our government and countrymen to the threat from China in the form of diversion of river waters in the South Central Tibetan region. In the process it would be robbing lower riparian states like Bharat, Nepal, Bhutan, Bangladesh, Myanmar and Thailand of their right to the waters from rivers like Brahmaputra and Sindhu which originate from Kailash - Manasarovar in Tibet. Joint mechanism established in 2007 between Bharat and China to oversee water related issues remain dysfunctional mainly due to the utmost secrecy maintained by China in its water management plans. Two of our states i.e. Himachal Pradesh and Arunachal Pradesh were hit by flash floods and it was suspected at that time that these floods were due to some form of interference in the river flow by the Chinese. Our engineers were not allowed to inspect the upper streams of the river by the Chinese government. The ABPS warns the government that unless the issue is addressed immediately the situation may lead to serious crises between the two countries.
The ABPS urges our Government to take note of the expanding military and diplomatic might of China not only in the immediate neighbourhood but also in the strategically important regions like Africa and the West Asia. China's 3.1 million strong Army is being rapidly modernized with newer weapons and technology. It has built all-weather roads and extended railway network along Tibet, Nepal and Bharat border. China today is a formidable player in the Indian Ocean region. It is establishing contact with all kinds of renegade dictators in the world including the North Korean and Sudanese dictators. Its strategic experts are propounding such disdainfully dangerous theories like Preventive Use of Nuclear Weapons suggesting that China should reserve the right of first attack against any nuclear power with nuclear weapons as a preventive measure.
In such a challenging scenario the ABPS calls upon the government to:
 1. Reiterate the Parliament’s unanimous resolution of 1962 to get back the territory acquired by China to the last inch.
2. Take effective measures for rapid modernization and upgradation of our military infrastructure. Special focus should be on building infrastructure in the border areas. Towards that, constitution of a Border Region Development Agency should be considered which would help prevent the migration of the people from the border villages.
3. Use aggressive diplomacy to expose the Chinese' designs globally. Use all fora including ASEAN, UN etc for mobilizing global opinion.
4. Disallow Chinese manufacturing industry free run in our markets. Prohibit Chinese products like toys, mobiles, electronic and electrical goods etc. Illegal trade being carried out through the border passes must be curbed with iron hand.
5. Follow strict Visa norms and maintain strict vigil on the Chinese nationals working in Bharat.
6. Restrict the entry of Chinese companies in strategic sectors and sensitive locations.
7. Mobilize the lower riparian states like Myanmar, Bangladesh etc to tell China to stop their illegal diversion of river waters.
अन्यत्र हिन्दू समाज व हिदुत्व और भारत को प्रभावित करने वाली जानकारी का दर्पण है विश्वदर्पण.आओ मिलकर इसे बनायें-तिलक

Saturday, February 19, 2011

विश्व कप क्रिकेट में पहले दिन भारत ने बंगला देश को उसके गृह प्रदेश में 87 रन से पीछे छोड़ते हुए विजयी शुभारम्भ का नाद किया; सभी भारतियों को बधाई !
अन्यत्र हिन्दू समाज व हिदुत्व और भारत को प्रभावित करने वाली जानकारी का दर्पण है विश्वदर्पण.आओ मिलकर इसे बनायें-तिलक